भू-माफियाओं के आगे बेबस प्रशासन? प्रतिबंध के बावजूद मोहला में धड़ल्ले से अवैध प्लाटिंग, राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल

मोहला मानपुर अं. चौकी। आदिवासी एवं अनुसूचित जनजाति जिला मुख्यालय मोहला में कृषि भूमि की अवैध प्लाटिंग का मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। आरोप है कि भू-माफिया राजस्व विभाग और उप पंजीयक कार्यालय की कथित मिलीभगत से कृषि भूमि को छोटे-छोटे टुकड़ों में बांटकर आवासीय प्लॉट के रूप में बेच रहे हैं, जबकि शासन के नियमों के अनुसार बिना डायवर्सन और आवश्यक अनुमति के ऐसी प्लाटिंग प्रतिबंधित है।
ग्रामीणों का आरोप है कि जिला बनने के बाद से मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी क्षेत्र भू-माफियाओं के लिए सुरक्षित ठिकाना बन गया है। जिला मुख्यालय से लगे ग्राम चिलमटोला में लगभग सात एकड़ से अधिक कृषि भूमि को बिना वैध अनुमति के प्लॉट में बदलकर बेचा जा रहा है। आरोप है कि इन भूखंडों की रजिस्ट्री और नामांतरण भी आसानी से हो रहे हैं, जिससे राजस्व विभाग और उप पंजीयक कार्यालय की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
ग्रामीणों के अनुसार पांच कृषि खसरों को 40 से अधिक हिस्सों में विभाजित कर दिया गया है। आरोप है कि नामांतरण के बाद संबंधित पटवारी मूल खसरे से नक्शा काटने में भी कोई आपत्ति नहीं जता रहे हैं। यदि यह सही है तो यह केवल नियमों की अनदेखी नहीं बल्कि शासन को लाखों रुपये के राजस्व की संभावित क्षति का मामला भी है।
ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि जिन लोगों द्वारा प्लाटिंग की जा रही है, वे पहले से विवादों में रहे हैं और अब कथित रूप से सिंडिकेट बनाकर कृषि भूमि को कॉलोनी के रूप में बेच रहे हैं। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि जिले में कॉलोनाइजर एक्ट के तहत कोई वैध कॉलोनाइजर पंजीकृत नहीं है और रेरा में भी किसी परियोजना का पंजीयन नहीं हुआ है, तो फिर बड़े पैमाने पर कॉलोनियां कैसे बस रही हैं? क्या प्रशासन को इसकी जानकारी नहीं थी, या फिर जिम्मेदार अधिकारियों ने जानबूझकर आंखें मूंद रखीं?
खरीददारों को कॉलोनी का सपना दिखाकर प्लॉट बेचे जाने के आरोप भी सामने आए हैं। मौके पर न तो पक्की सड़क, न नाली, न बिजली की समुचित व्यवस्था और न ही अन्य बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हैं। ऐसे में भविष्य में सबसे अधिक नुकसान उन लोगों को उठाना पड़ सकता है जिन्होंने जीवनभर की कमाई लगाकर ये भूखंड खरीदे हैं।
पूरे मामले में प्रशासन की कार्यशैली कठघरे में दिखाई दे रही है। यदि वर्षों से अवैध प्लाटिंग चल रही थी तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई? यदि कार्रवाई नहीं हुई तो जिम्मेदारी किसकी है? और यदि अधिकारियों को जानकारी थी तो फिर रजिस्ट्री, नामांतरण और नक्शा विभाजन की प्रक्रिया कैसे पूरी होती रही?
हालांकि तहसीलदार मोहला नेहा विश्वकर्मा ने कहा है कि अवैध प्लाटिंग का मामला सामने आया है। रजिस्ट्री एवं नामांतरण रोकने के लिए पत्र जारी किया जाएगा तथा संबंधित पटवारियों से जानकारी लेकर यह पता लगाया जाएगा कि मोहला में कितनी अवैध प्लाटिंग हुई है।
अब देखने वाली बात यह होगी कि प्रशासन इस मामले में केवल पत्राचार तक सीमित रहता है या फिर भू-माफियाओं और कथित मिलीभगत करने वाले अधिकारियों के खिलाफ ठोस कार्रवाई कर अवैध प्लाटिंग पर प्रभावी रोक लगाता है।



